



रागदरबारीननकू मियां यूपी में
अचानक ननकू मियां हमसे टकरा गए। हमने हैरानी जताई कि ज्ननकू मियां, आप दिल्ली में..? उन्होंने कहा कि हां, हम दिल्ली में, तो..? हमने फिर हैरानी जताई कि इस वक्त आप दिल्ली में कैसे हो सकते हैं? उन्होंने कहा कि इस वक्त हम दिल्ली में क्यों नहीं हो सकते हैं?. हम तो सालों से दिल्ली में हैं! हमने कहा कि ये तो ठीक है कि आप सालों से दिल्ली में दीखते रहे हैं, मगर इस वक्त भी आप दिल्ली में..? उन्होंने हैरानी से पूछा कि जब हम सालों से दिल्ली में पाए जाते हैं और इस वक्त भी दिल्ली में ही पाए जा रहे हैं तो जनाब इसमें आपको ताज्जुब क्यों हो रहा है? हमने उन्हें याद दिलाया कि जब पिछले रोज आप मिले थे तो आपने कहा था कि चुनाव में आप यूपी जाएंगे..। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि ओह, तो आप उस बारे में पूछ रहे हैं? हमने कहा कि जी हां, हम उसी बारे में पूछ रहे हैं। वे कुछ देर सोचने के बाद बोले कि भई, सोचा तो था कि चुनाव में यूपी जरूर जाएंगे पर गए नहीं। हमने पूछा कि ज्हम यही तो पूछ रहे हैं कि आप यूपी क्यों नहीं गए? दिल्ली में क्यों दिख रहे हैं? फिर से उन्होंने गंभीर मुद्रा अख्तियार की। उन्हें देखकर हमें ये समझते देर न लगी कि हो न हो, यूपी न जाने के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य जरूर है। उन्होंने कुछ देर सोचा, फिर बोले कि जब ये आरोप लगाए जाते हैं कि बहुत से लोग वोट डालने नहीं जाते हैं तो हमने सोचा कि इस बार चुनाव में जरूर जाएंगे, वोट डाल कर आएंगे और वोट नहीं देने आने का आरोप लगाने वालों को करारा जवाब देकर आएंगे, मगर..। वे फिर चुप हो गए और फिर से कुछ सोचने लगे। हमने उनकी तंद्रा तोड़ी, मगर क्या? वे आगे बोले कि जब हमने इस ओर सोचा कि हम किसको वोट देंगे तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए, इसलिए हमने यूपी जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया..। उन्होंने अभी भी आधी ही बात बताई, इसलिए हमने पूछा कि आप किसी निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुंच पाए? अबकी बार जवाब देने की बजाय उन्होंने उल्टा हमसे ही सवाल किया कि हमारी जगह खुद को रखकर देखो और तुम किस निष्कर्ष पर पहुंचते हो, हमें भी बताओ! हमने उनकी बात को हल्के से लेते हुए कहा कि हमारी छोड़िए, अपनी बताइए कि आप किस निष्कर्ष पर पहुंचे? वे बोले, मुख्य रूप से यूपी में चार पार्टियां मैदान में हैं। कांग्रेस के युवराज कह रहे हैं कि पांच साल दे दो। कांग्रेस सालों से राज करती आई है, तब कुछ नहीं कर पाई, अब पांच साल में उसके युवराज जाने कैसे कद्दू में तीर मार लेंगे, मालूम नहीं! सपा के राज से उकता कर पिछली बार बसपा की सरकार बनाई गई थी, मगर उसका राज कैसा रहा, ये बताने की जरूरत नहीं है। अब बची भाजपा, वो तो चुनाव होने से पहले ही अपनी इच्छा बता रही है कि अगर उसे सत्ता मिली तो वह कैसे-कैसे लोगों को मंत्री बनाएगी। हमने कहा कि आप पार्टी क्यों देख रहे हैं, अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों को देखिए और ये तय कीजिए कि आपको किसे वोट देना है। वे नाराज होते हुए बोले कि अंत में राज तो पार्टी का होगा न, तो हम उम्मीदवार देखकर क्या करेंगे? खैर, ननकू मियां के साथ लंबी बहस चली, मगर हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए। इसके बाद ननकू मियां बहुत दिन तक दिखाई नहीं दिए। एक दिन अचानक ही प्रकट हुए। हमने पूछा कि आप इतने दिन कहां गायब थे? उन्होंने बताया कि यूपी गए हुए थे, चुनाव में.। हमने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा कि क्या आपने वोट दिया और दिया तो किसको दिया? उन्होंने बताया, मैंने पार्टी नहीं, उम्मीदवार देखे, मगर पार्टियों की तरह उम्मीदवारों को लेकर भी कंफयूज ही रहा.. तय नहीं कर पाया कि किसे अपना वोट दूं. लेकिन मैंने वोट दिया, ताकि किसी को ये कहने का मौका न मिले कि लोग वोट देने नहीं आते हैं। हमने पूछा कि कंफयूजन होने के बावजूद आपने किस उम्मीदवार को वोट दिया। वे बोले कि किसी उम्मीदवार के आगे मोहर नहीं लगाई। दरबारी लाल |


