



संपादकीयवीआइपीवाद
हमारे यहां भयंकर किस्म का जातिवाद तो मौजूद है ही, किसिम-किसिम के अन्य जातिवाद भी इसके समांतर पनपते चले गये हैं। मसलन अफसरों-अफसरों के बीच का अपना एक जातिवाद है। आइ.ए.एस. अफसर उच्च कुलस्थ ब्राह्मणों की श्रेणी में आते हैं और विदेश सेवा के आइ.एफ.एस. अधिकारियों को छोड़कर बाकी सब इनसे नीचे की श्रेणियों में आते हैं। फिर किस अफसर का बड़ा कमरा है, किसका छोटा है, किसका मंत्रीजी के करीब है, किसका उनसे बहुत दूर है आदि-आदि अन्य जातिगत श्रेणियां भी हैं। बड़े अफसर हैं तो कमरे के साथ अटैच बाथरूम भी होगा, बिल्कुल चकाचक। छोटे अफसरों का एक अलग सामूहिक बाथरूम होगा। बाकी कर्मचारियों का बिल्कुल ही अलग होगा। मतलब एक बाथरूम में वे सब एक साथ निवृत्त भी नहीं हो सकते। फिर एक किसिम का जातिवाद यह है कि कौन वीआइपी है और कौन नहीं है। फिर वीआइपी होते हुए भी किसकी गाड़ी में लाल बत्ती लगी है और किसकी में नहीं लगी है। किसकी गाड़ी के आगे साइरन बजता है, किसके आगे नहीं बजता है। दरअसल जितनी तरह की कुंठाएं समाज में हैं, उतनी तरह के वीआइपी भी हमारे यहां पैदा हो चुके हैं। इन सबको सब जगह तरजीह चाहिए, यहां तक कि हम पत्रकारों को भी। कुछ की तो जीवन भर की पत्रकारिता का परम उद्देश्य ही वी.आइ.पी. वाली तरजीह पाना होता है। इसके बिना वे जीना ही भूल चुके होते हैं। कहीं भी, कभी भी वे साधारण तो रह ही नहीं सकते और रहना पड़ ही जाए अगर गलती से तो सामने वाले पर पत्रकार होने का रौब जमाते हैं। कई बार यह रौब जमाना उल्टा भी पड़ जाता है जबकि विनम्रता बड़ी आसानी से काम कर जाती है लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि साधारण बनकर पेश आओ तो घंटों बाद भी कोई बात नहीं सुनता। यह सब वीआइपीवाद के चलते है। हमारे नेता भी इस नये जातिवाद में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की श्रेणी में आते हैं। यह अलग बात है कि कोई महज गांव स्तर का वीआइपी होता है, कोई कस्बे स्तर का, कोई जिला स्तर का, कोई प्रदेश स्तर का, कोई राष्ट्रीय स्तर का और राष्ट्रीय स्तर पर भी तरह-तरह के वीआइपी हैं। सिर्फ सरकारी फलैट मिला हुआ है या बंगला मिला है और बंगला मिला है तो कितना बड़ा है कहां मिला हुआ है। वगैरह-वगैरह। हमारे धर्म-पुरुषों को भी वीआइपी बनने का जबर्दस्त रोग है और क्यों न हो, जब बड़े-बड़े नेता-अफसर सब न जाने और क्या-क्या पाने की अंधलिप्सा में उनके चरणों में गिरे रहते हों, पड़े रहते हों। एक स्वर्गीय साधु महाराज तो आशीर्वाद देने के लिए भक्तों के सिर पर लात जमाते थे और भक्त आनंदपूर्वक इसे खाते थे। देश के बड़े से बड़े नेता भी उनकी लात खाकर शायद गर्व महसूस करते थे। तो इधर एक खबर आई है कि कांची कामकोटि के शंकराचार्य, दिल्ली के झंडेवालान के बाबा लक्ष्मण दासजी महाराज तथा बंगलुरू के रामचंद्र पुरा मठ के गुरु चाहते हैं कि वे जब भी हवाई जहाज से सफर करें तो उनकी सुरक्षा जांच न हो। कांची के शंकराचार्य की तो सिफारिश कांग्रेस तथा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की है तो बताते हैं कि तुरंत उसी दिन से उनकी सुरक्षा जांच भी बंद हो चुकी है, जबकि आप जानते हैं कि किसी सरकारी आदेश का इस कंप्यूटर युग में भी कहीं भी पहुंचना कितना कठिन होता है। पहुंच जाए तो उस आदेश की प्रति मिलना और भी मुश्किल होता है। उससे भी दिक्कत भरा होता है उस आदेश का पालन करवाना। लेकिन आप वीवीवीवीवीवीआइपी हों, तो फिर तो एक मिनट भी नहीं लगता है। मुंह से निकली बात ही आदेश हो जाती है। जैसे इस देश की इस सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्री रहे प्रफुल्ल पटेल की बेटी और उसके ससुराली चाहते थे कि वे मालदीव जाएं तो साधारण इकोनॉमिक क्लास से नहीं बल्कि एक्जीक्यूटिव क्लास से जाएं तो फौरन एयर इंडिया ने वह विमान प्रस्तुत कर दिया, जिसमें कि एक्जीक्यूटिव क्लास थी वरना जिस विमान का मालदीव जाना तय था, उसमें सिर्फ इकोनॉमी क्लास थी। तो हमारे देश में सबको वीआइपी होना मांगता। और जो वीआइपी नहीं है उसे ठंड से, लू से मरना मांगता। उसकी बेटी-बहू को अस्पताल से बाहर बच्चा देना मांगता। तड़प-तड़प कर मर जाना मांगता। बेरोजगार होना मांगता। न्यूनतम मजदूरी पाना भी नहीं मांगता। जहां देखे वहां भीड़, धक्का-मुक्की, बेइज्जती, भूख और बीमारी मांगता। और हमारे धर्माचार्य इस सबके बीच इसी से खुश रहते हैं कि उनकी कार सीधे हवाई जहाज पर चढ़ने की सीढ़ी तक पहुंच जाया करेगी। उनका दर्जा भी किसी मंत्री के बराबर हो जाएगा। एक बाबा के बारे में बताया गया है कि उन्हें कोई दूसरा मानव छू तक नहीं सकता। पता नहीं, जिसे दूसरा मानव छू भी नहीं सकता, यहां तक कि उनका भक्त भी उनके करीब नहीं आ सकता, ऐसे महाराज का काम चल कैसे पाता होगा और अगर उन्हें बुढ़ापा नहीं आ चुका है, अभी आने वाला है तो उनका बुढ़ापा आखिर कैसे कटेगा? एक और महाराज हैं जो चाहते हैं कि जिन मूर्तियों को वे साथ ले जाते हैं, उन्हें सुरक्षा वाले जांच के लिए देखें नहीं क्योंकि मूर्तियों का पिटारा खोलने से पहले उन्हें स्नान करना पड़ता है! इस हिंदुस्तान में ही यह सब संभव है। जाहिर है कि ये नखरे अमेरिका इत्यादि में नहीं चलते। वहां इस देश का रक्षा मंत्री भी जाता है तो उसे सुरक्षा-जांच करवानी पड़ती है और पूर्व राष्ट्रपति भी जाता है तो उसे सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। बल्कि कहीं पढ़ा था कि अमेरिका वाले इससे परेशान हैं कि भारत में इतने सारे वीवीआइपी हैं कि वे किस-किसको सुरक्षा जांच से छूट दें! जाहिर है कि साधु बाबा लोग भी सुरक्षा-जांच से वहां बच नहीं पाते और अमेरिका का तो ऐसा भयंकर आकर्षण है कि गृहस्थ हो या संन्यासी हर आदमी-औरत लपक-लपक कर वहां जाना चाहता है- साल में एक बार तो जरूर ही। बहरहाल हर समृद्घ-ताकतवर भारतीय आदमी-औरत के अंदर एक छुपा हुआ सामंत बैठा हुआ है, जो इस युग में वीआइपी के रूप में भी प्रकट होता है। लोग इसी से अपने अहम की तुष्टि करते रहते हैं और खुश रहते हैं कि उनकी बड़ी इज्जत है, बहुत ज्सम्मान है। इस देश से भ्रष्टाचार भी शायद तभी जाए, जब यह वीआइपीवाद यहां से चला जाए। सचमुच कोई अशक्त हो, लाचार हो, परेशान हो, बेहद बीमार हो, उसके साथ विशेष-व्यवहार किया जाए तो किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यहां तो हरेक ताकतवर को हर जगह विशेष व्यवहार ही चाहिए। पिछले शुक्रवार को दिल्ली के कुछ इलाकों में घंटों जाम रहा, जिसका एक बड़ा कारण यह भी था कि उस दिन वीआइपी मूवमेंट भी काफी था यानी वीआइपी साहबों के कारों के काफिले उस क्षेत्र से गुजरने थे, जिनके लिए आम लोगों से उस रास्ते को कुछ समय के लिए मुक्त कराना जरूरी था। चंडीगढ़ में एक बार प्रधानमंत्री के लिए इस तरह के इंतजाम करने के कारण एक मरीज की मौत हो चुकी थी। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि ऐसा आइंदा नहीं होना चाहिए लेकिन यह बात उसके बाद न प्रधानमंत्री को याद रही होगी और न उनके सुरक्षा प्रबंध करने वालों को। नेता नाजुक हालात में ऐसी भली-भली बातें करने को मजबूर हो जाते हैं। इन पर ध्यान देकर नौकरशाह अपनी नौकरी तो नहीं गंवा सकते! बहरहाल नक्कारखाने में हमारी ये तूती की आवाज है। बल्कि नक्कारखाने में तूती की आवाज जितनी तेज होती है उतनी भी यह है या नहीं- यह नहीं मालूम, फिर भी जो सुन सकें, उनके लिए तो यह तूती की आवाज तो है ही। |


